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विविधताओं में एकता का देश है हमारा भारत.रहन-सहन, खान-पान, जाति-धर्म से लेकर भाषायी भिन्नता भी पायी जाति हैं. करीब 780  भाषाएँ यहाँ बोली जाती है और The People's Linguistic Survey of India (PLSI) के सर्वे के अनुसार 250  से अधिक भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं. भाषयी विविधताओं वाले इस देश में एक उपयुक्त शिक्षा नीति का होना आवश्यक है. भारत सरकार ने प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में लागु किया, उसके बाद समय-समय पर 1986 में स्व. श्री राजीव गांधी के समय में और पुनः 1992 में संशोधित किया गया.
शिक्षा... एक ऐसा विषय, जो भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश के लिए काफी मायने रखता है.  भारतीय नागरिकों को मताधिकार सिर्फ उम्र के आधार पर प्रदान की गयी है. शिक्षा को हमेशा भारतीय राजनेताओं के द्वारा दूसरे दर्जे पर रखा गया. भारतीय नागरिक जिसे किसी भी भाषा में लिखने-पढ़ने का ज्ञान को शिक्षित मान लिया जाता है. क्या उस व्यक्ति में देश के राजनीती, देश के अंदर-बाहर हो रही गतिविधियों का सर्वेक्षण की क्षमता होती है ? क्या वो व्यक्ति अपने अधिकार और कर्तव्य को सही ढंग से समझ सकता है.. ? और जब एक नागरिक ना तो अपना अधिकार ही जानता हो और ना ही अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक हो तो वो अपने देश के लिए क्या योगदान दे सकता है..? इन सभी कारणों के पीछे हमारी दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति है.
भारतीय शिक्षा पद्धति आदि काल से संक्रीणा से ग्रसित रहा है. आदि काल में शिक्षा सिर्फ कुलीनों  को दिया जाता था वो भी जन-भाषा में नहीं वरन संस्कृत में जो आम आदमी के समझ से परे था, हालाँकि कहीं-कहीं संस्कृत जन-भाषा भी थी परन्तु शिक्षा का अधिकार केवल कुलीनों को था. मुग़ल काल में भी शिक्षा कि स्थिति कमोबेश वही रहा. अंग्रेज़ों ने ना सिर्फ भारतीय खजाना खाली किया बल्कि भारत कि अतुल्य-अमूल्य विरासत को भी जबरदस्त नुकसान पहुँचाया. एक सिमित वर्ग तक शिक्षा को पहुँचाया और आम आदमी को शिक्षा से काफी दूर कर दिया, इसका नतीजा यह हुआ कि आजादी के समय मात्र 12 % के करीब लोग साक्षर थे.
आजादी के बाद कि शिक्षा नीति भी काफी ढीली रही.. भारत में हर राज्य की भाषा लगभग अलग है. इसी कारन चाह कर भी हमारे संविधानविद हिंदी को राष्ट्रभाषा ना बना सके और जब देश की एक भाषा ही ना हो तो समान शिक्षा नीति भी लागु नहीं हो सकता है.
राजनेताओं की कमजोर इच्छाशक्ति भी इस दोषपूर्ण शिक्षा नीति के प्रति जिम्मेवार  है. आज भी उन सभी बच्चो के लिए, जो आमिर घर से जुड़े होचाहे वो देश के किसी भी कोने में हों, एक समान शिक्षा दी जातीं है, इनके लिए सीबीएसई और ICSE का गठन किया गया है. इनके बच्चे देश के वो युवा बनते हैं जो अपना अधिकार और कर्तव्य जानते हैं. ये बच्चे अंग्रेजी को व्यवहार में अपनाकर खुद को गौरवान्वित महशुस करते हैं, देशी भाषाओं में बात इनको अच्छा नहीं लगता. और आजकल हमारा समाज भी अंग्रेजी को विद्व्ता का पैमाना मानने लगे हैं. वहीँ दूसरी तरफ देश के बहुसंख्यक बच्चे जो अन्य भाषाओं में अध्ययन करते हैं आगे चलकर इन्हें हर जगह दिक्कतें आती है.  ऊँची शिक्षा प्राप्त करने से लेकर नौकरी तक में इनको संघर्ष करना पड़ता है. महानगरों में ये बच्चे अपने क्षेत्र में निपुण होने के बावजूद, अंग्रेजी ना आने के कारन हीन-भावना से ग्रसित हो जाते हैं. ये बात अलग है कि बाधाएं कभी आगे बढ़ने वालों को रोक नहीं पाती हैं.

आज देश को जरुरत है एक ऐसी शिक्षा पद्धति कि जो संपूर्ण देश में एक समान हो, कुछ लोग ऐसा बहाना बनाते हैं कि जहाँ हिंदी या अंग्रेजी दोनों भाषा नहीं बोली जातीं है वहां एक समान शिक्षा पद्धति कैसे लागु हो सकती है. ये बात पूरी तरह से गलत है, बच्चे कोई भी भाषा में पढाई कर सकते हैं और अगर सरकार क्षेत्रीय भाषा को बचाना चाहती है तो वो एक विषय के रूप में 10वीं तक रख सकते हैं. इससे ना सिर्फ देश में एक समान शिक्षा का प्रसार होगा वरन देश में शिक्षा में भेद-भाव ख़त्म होगा.
दूसरी महत्वपूर्ण बात, शिक्षित नागरिक का परिभाषा को बदलने का समय आ गया है. किसी भी भाषा में लिखने-पढ़ने  का ज्ञान होने को शिक्षित कहना आज के दौर में अप्रासंगिक है. एक शिक्षित नागरिक का मतलब ये होना चाहिए कि , वो जिसने 10 वीं तक कि पढाई कि हो और जो अपने अधिकार के प्रति जागरूक तथा अपने कर्तव्य के प्रति सतर्क हो.

धन्यवाद...

पंकज सिंह

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