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Showing posts from June, 2015

12वीं की शायरी

khayal unka aaya or … kambakht dil ne unse puchha... jara batao mere dil ke mehman meri kaun ho tum ????   jiske liye me din rat tarpta hun Jagne ke waqt sota, or sone ke waqt jagta hun, tumse na koi jawab aaya to mere dil ne khud hi apna hal farmaya.............    sawan ki rimjhim ghata ho tum, bhare hue jam ki nasha ho tum , khilte hue kali ka khwab ho tum, bhawnro ki dil ki aawaj ho tum    chhalkte hontho ki pyas ho tum dhadkte dil ki ehsas ho tum log ji lete ha sari jindgi jise dekhkar kudrat ka esa ehsas ho tum tumko khud hi nai pata k kya ho tum mere liye to jamin aasman ho tum karta hun pyar aapse itna ki lagta ha dono jahan ho tum

मेट्रो का सफर

सुबह-सुबह घर से निकला ऑफिस के लिए, नया-नया दिल्ली आया था सोचा मेट्रो से ही चला जाय. वैसे मेट्रो के सफर का आनंद मैं ले चूका था. परन्तु ऑफिस के लिए प्रथम था. ग्रीन लाइन की मेट्रो मिली और मैं ४ कोच वाले मेट्रो, जो कीर्तिनगर की ओर जा रही थी, प्रविष्ट हुआ. अध्भुत आनंद की अनुभूति हुई....... पूर्णतः साफ़ एसी कोच...सभी लोग बिजी दिख रहे थे.. कुछ अपने मोबाइल पर चैट कर रहे थे तो कुछ गेम का आनंद ले रहे थे...कुछ सज्जन जिन्हें बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था.. या तो वो डेली न ्यूज़ पेपर में व्यस्त थे या फिर देश के समस्याओं पर चर्चा में लगे थे... गाड़ी हर २ मिनट पर 30 सेकंड के लिए रूकती हुई चल रही थी...अशोक पार्क में स्टेशन आते ही लोगों का वो हुजूम आया कि पता ही नहीं चला कि मैं कैसे एक दरवाजे क़े पास से दूसरे क़े पास पहुँच गया. गाड़ी कीर्तिनगर पहुंची, पर गाड़ी रुकते ही लोग ऐसे भागे जैसे आज सिर्फ एक गाड़ी आने वाली है... एक सज्जन ने ऐसे धक्का दिया की मैं गिरते-गिरते बचा... और ऊपर से उनकी सलाह --भाई अगर जल्दी न हो तो साइड हो जा...ऑफिस वालों को जाने दे... | यह मेरी यात्रा का प्रथम पड़ाव था, अब मुझे ब्लू लाइन...

दिल्ली बनाम गाँव की गर्मी

दिल्ली का तापमानं 45 क़े पार होने को है.. सभी बचने क़े उपाय ढूंढ़ रहे हैं...... मैंने भी महसूस किया की गर्मी तो है. पर अचानक से याद आ गया अपने गॉव के वो दिन जब गर्मी हमसे डरा करती थी.... सुबह को तो 5 बजे तक उठते थे या सही सब्दों में कहें तो उठाया जाता था... फिर जरा फ्रेश हो के घूमने निकलते थे दोस्तों के साथ ... और दूर आम के बगीचों से होकर निकलते थे... सुबह की वो प्यारी पवन... आम की बगीचों के वो खुसबू .. पके आम चुनने की होर.... और बीच में राजू का वो ठहाका... सच बता रहा हूँ पूरा गाछी (आम के बगीचों को हमारे यहाँ गाछी कहते हैं) हमारी बातों और उसके ठहाकों से गूंजता था..| 6 .15 तक सभी आनंदपुर क़े प्लेग्राउंड में पहुँच जाते थे और फिर शुरू होता था क्रिकेट, जो हमारे गॉव में काफी लोकप्रिय हैं हर उम्र क़े लोगों में ... चाहे वो प्रातः भ्रमण को निकले बुजुर्ग हों या बच्चे या चौक पर चाय क़े चुस्की लेते अन्य लोगों क़े साथ दुकानदार.. ये सभी हमारे दर्शक थे...8 बजे तक पसीने से तर-बतर होकर घर वापस होते थे .. तो घर पर आते ही वही दो लाइन सुनना परता था... पढाई लिखाई तो है नहीं... बस गावस्कर बनना है... किसी दिन ...

भूली-बिसरी यादें

पढाई करने के अपने तरीके होते हैं.. प्रत्येक विद्यार्थी के अपने नियम होते हैं.. कुछ दिन में ज्यादा अच्छे से पढ़ते हैं तो कुछ रात में.. किसी को सारी रात जाग के पढ़ने में रूचि होती है तो कुछ सुबह 4  बजे उठ के पढ़ते हैं..हाँ कुछ लोग जोर से पढ़ते हैं तो  बांकी मन ही मन. हमें तो वो जमाना याद है जब घर में जोर से ना पढ़ना, ना पढ़ने के बराबर माना जाता था. पढाई के ये बचपन के तरीके थे. पर विद्यार्थी पढ़ते कब थे..कुछ लोग जो हमारे बैच के टॉपर होते थे वो पुरे साल पढ़ते थे..और  हम जैसे बांकी लोग परीक्षा के समय पूरी रात जाग के पढ़ते थे और परीक्षा भवन में प्रश्न देख कर टीचर को मन ही मन गुस्सा करना  ...और हाँ  हमेशा एक ही चीज कहते थे यार इस बार के पेपर सबसे कठिन थे और 2 -3  प्रश्न तो किताब के बाहर से थे ..फिर लौट आते हैं हमारे टॉपर पर...गणित के एक किताब हमसे ना बनता था और वो कई एडिशन के किताब बनाते थे.. हम फेयर कॉपी बना के खुश हो जाया करते थे और वो कमबख्त रट्टा मार के हीरो बने रहते थे.. पुरे साल हम हँसते थे और रिजल्ट के दिन उनकी हंसी देखी ना जाती थी... पर क्या कर सकता था वो टॉप...