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बेटी नहीं हम, संतान तुम्हारे, अब ये दूरी घटने दो,
घुट रहें हैं सदियों से, इक पल के लिए जीने दो,
बाँध रखा है पंख जिनमें, अब वो बेड़ी खुलने दो,
हो गयी इम्तिहां का हद, [अब तो मुझे उड़ने दो]2

एक बेटे की लालच में, आने ना दिया संसार में,ये बताओ कौन लाया था तुम्हें संसार में,
कभी तुम्हारे रिवाज ने मारा, कभी तुम्हारे प्यार ने,
जो बचे उनको मारा, झूठे शान और संस्कार ने,
बहुत कर लिया ढोंग प्रेम का, अब तो बस रहने दो,
हो गयी इम्तिहां का हद, [अब तो मुझे उड़ने दो]2

दंभ भरते हो पुरुषार्थ का, होता क्या है वो भला,
जीत तुमको तब मिली है, जब शक्ति बनी है ये अबला,
शिक्षा, स्वास्थ्य, और सेवा में हमसे आगे कौन है,
पर है मुस्किल तुम्हें बताना, अब तक संसद भी मौन है,
21वीं सदी में आ गए तुम, अब तो बस रहने दो,
हो गयी इम्तिहां का हद, [अब तो मुझे उड़ने दो]2

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