पढाई करने के अपने तरीके होते हैं.. प्रत्येक विद्यार्थी के अपने नियम होते हैं.. कुछ दिन में ज्यादा अच्छे से पढ़ते हैं तो कुछ रात में.. किसी को सारी रात जाग के पढ़ने में रूचि होती है तो कुछ सुबह 4 बजे उठ के पढ़ते हैं..हाँ कुछ लोग जोर से पढ़ते हैं तो बांकी मन ही मन. हमें तो वो जमाना याद है जब घर में जोर से ना पढ़ना, ना पढ़ने के बराबर माना जाता था.
पढाई के ये बचपन के तरीके थे. पर विद्यार्थी पढ़ते कब थे..कुछ लोग जो हमारे बैच के टॉपर होते थे वो पुरे साल पढ़ते थे..और हम जैसे बांकी लोग परीक्षा के समय पूरी रात जाग के पढ़ते थे और परीक्षा भवन में प्रश्न देख कर टीचर को मन ही मन गुस्सा करना ...और हाँ हमेशा एक ही चीज कहते थे यार इस बार के पेपर सबसे कठिन थे और 2 -3 प्रश्न तो किताब के बाहर से थे ..फिर लौट आते हैं हमारे टॉपर पर...गणित के एक किताब हमसे ना बनता था और वो कई एडिशन के किताब बनाते थे.. हम फेयर कॉपी बना के खुश हो जाया करते थे और वो कमबख्त रट्टा मार के हीरो बने रहते थे.. पुरे साल हम हँसते थे और रिजल्ट के दिन उनकी हंसी देखी ना जाती थी... पर क्या कर सकता था वो टॉपर थे और हम बैक बेंचर. खैर दशवीं की परीक्षा तो पास कर ली किसी तरह ...
बारहवीं की जिंदगी थोड़ी मजेदार थी.. अब हमें कई चीजों की आजादी थी.. जेब में पैसे रहते थे..भले ही वो टीचर और मकान मालिक के लिए हो.... यारों के साथ दरभंगा के हर गली घूम सकता था.. पर कारण एक ही होता था ...हर शाम में श्यामा माई के दर्शन को जरूर जाता था..और हाँ कभी कभी तो मनोकामना मंदिर में अपनी छोटी-बड़ी मनोकामना भी लिख आता था... और सबसे बड़ी बात अब मूवी थिएटर में देखने का बहाने ढूढ़ने नहीं परते थे.. फिजिक्स का कोचिंग जिंदाबाद ... और धन्यवाद श्री जी. पी. सिंह सर..आपके कारण कई शानदार फिल्म देख पाया.. पर पढ़ने का शौक अब भी नहीं जगा था. हमारे अनेक दोस्तों ने शहरी पढाई के तरीकों अपना लिया था.. संजय कुमार 6 बजे शाम में सो जाते थे और 10 बजे रात में उठते थे फिर पूरी रात मेरी नींद की ..... करते थे. मुझे भी एक रात लगा क़ि आज मैं भी पढ़ लूँ..पर एक तो शाम में नींद नहीं हुई और रात में 10 बजे बैठ के पढ़ना शुरू किया 11 बजे निंदिया अपने गोद में समेटने लगी और सुबह आँख खुली तो मैंने अपने आपको किताबों पर सोया पाया.. फिर राकेश ने बताया की रात में कम खाया करो और पानी ज्यादा तो पढाई होगी... पढाई तो नहीं हुए पर उस रात के 12 बजे में मैगी जरूर खाया और पानी ज्यादा पिने के कारण ... पूरी रात चलने के प्रैक्टिस करता रहा.. खैर किसी तरह साइंस में पास कर लिया तो घरवालों और दोस्तों ने समझा के पढ़ रहा था शहर में...
अब हमारे यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है बारहवीं के बाद क्या करूँ... जो टॉपर थे वो तो इंजीनियर की पढाई करने निकल पड़े ..कुछ ने अच्छे एग्जाम पास भी किये और बच गए हम जैसे लोग जिनको अब घर और बाहर दोनों जगह ताने मिलते थे...जिंदगी के असली सचाई अब सामने थी.. दूसरों के अच्छे पढाई के मजाक उड़ाने वाले हम जैसे लोग आज खुद मजाक बन गए थे.. इसी उधेर-बन में एक साल निकल गया और हम वहीँ के वहीँ थे.. गांव वापस आ गया था क्यूंकि दरभंगा काफी मंहगा होते जा रहा था.. और अब कुछ अलग करने का मन हो रहा था.. पर क्या करूँ .. जिन पढ़ने वालों का मजाक बनाया करता था आज वो बड़े शहरों से आकर मुंह चिढ़ाते थे.. हम सिंपल ग्रेजुएशन कर के क्या कर लेंगे .. हमारे यहाँ तो हजारों बेरोज़गार बैठे थे... जिंदगी रुक सी गयी थी..
फिर हमें 3 -4 दोस्त नए मिले.. जो मेरी तरह ही जिंदगी के झूले झूल रहे थे... हम सब ने मिल के सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की ..पर हमें ना तो राह नजर आ रहा था और ना ही इस पर चलने वाले राही. हमें राह खुद बनाके मंजिल पानी थी और सबसे बड़ी समस्या थी लोगों में विश्वास ..क्यूंकी सरकारी नौकरी का मिलना असंभव माना जाता था उस समय में..ना तो हमारे पास पैसे थे और ना ही हम उतने कुशाग्र बुद्धि थे..हमने Student 's club की सहायता से पढाई शुरू किया... शुरू में तो सब कुछ अजीब सा था...पर अब हमें सिर्फ पढ़ना था..जहाँ एक समय में १ घंटा पढ़ने में रोता था पर अब घटों पढाई होती थी.. पर पढाई तब मजेदार बना जब हम दोस्तों के बीच में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा शुरू हुआ...
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