दिल्ली का तापमानं 45 क़े पार होने को है.. सभी बचने क़े उपाय ढूंढ़ रहे हैं...... मैंने भी महसूस किया की गर्मी तो है. पर अचानक से याद आ गया अपने गॉव के वो दिन जब गर्मी हमसे डरा करती थी.... सुबह को तो 5 बजे तक उठते थे या सही सब्दों में कहें तो उठाया जाता था... फिर जरा फ्रेश हो के घूमने निकलते थे दोस्तों के साथ ... और दूर आम के बगीचों से होकर निकलते थे... सुबह की वो प्यारी पवन... आम की बगीचों के वो खुसबू .. पके आम चुनने की होर.... और बीच में राजू का वो ठहाका... सच बता रहा हूँ पूरा गाछी (आम के बगीचों को हमारे यहाँ गाछी कहते हैं) हमारी बातों और उसके ठहाकों से गूंजता था..|
6 .15 तक सभी आनंदपुर क़े प्लेग्राउंड में पहुँच जाते थे और फिर शुरू होता था क्रिकेट, जो हमारे गॉव में काफी लोकप्रिय हैं हर उम्र क़े लोगों में ... चाहे वो प्रातः भ्रमण को निकले बुजुर्ग हों या बच्चे या चौक पर चाय क़े चुस्की लेते अन्य लोगों क़े साथ दुकानदार.. ये सभी हमारे दर्शक थे...8 बजे तक पसीने से तर-बतर होकर घर वापस होते थे .. तो घर पर आते ही वही दो लाइन सुनना परता था... पढाई लिखाई तो है नहीं... बस गावस्कर बनना है... किसी दिन हाथ पैर टूटेगा तो परे रहना....दिल डूब जाता था पर हिम्मत नहीं हारता था.. जब बाबा कहते थे... अरे ये पढाई तो करता है ना समय पर , सुबह में कसरत के बदले खेलता है... स्वस्थ रहेगा... हलकी से मुस्कान लिए किताब उठाता था और निकलता था पढाई के लिए जो ग्रुप में हुआ करती थी..दोस्तों के साथ.. न तो बिजली के आपूर्ति थी वहां और न ही किसी अन्य प्रकार की सुविधा फिर भी गर्मी का नाम नहीं होता था... कभी-कभी मूवी का प्रोग्राम बनता था तो कुछ पढ़ाकू दोस्त गर्मी का हवाला देकर मुकरने की कोशिस करते थे.. परन्तु विवश थे साथ तो रहना था और हम भी तर्क तो देते थे ..." देखो ये किसान खेत में हल चलाता है.. इसे गर्मी कहाँ लगती है.. वो मजदुर जो घर तैयार कर रहे है कहाँ लगती है गर्मी..और तुम हो ही रोंदू .." फिर क्या .अजी जग जाता था उनके अंदर का तूफान और सब निकल परते थे 7 किलोमीटर दूर थिएटर में मूवी देखने वो भी साइकिल से... भाई कहाँ थी गर्मी..?
शाम के घड़ी में 3 .45 हुए या नहीं ...यारों की दूसरी टोली आ जाती थी क्रिकेट के लिए चलो भाई आज लेट हो गयी और हम 4 .15 तक तो टीम चयनित करते थे, कप्तान होने के नाते जिम्मेवारी अधिक थी... वैसे तो विकेटकीपिंग करता था पर हमेसा फील्डिंग के समय ये ध्यान में रखना परता था की जहाँ चेहरे पे धुप जाती हो वहां रोटेशन जारी रहे.. वरना आप जानते हैं.... वैसे भी धुप में टॉस जितना अहम माना जाता था वरना हारने पर मन ही मन ... | शाम में थके हारे.. धुप के मारे घर जाते थे...फिर सुबह का संवाद दुहराया जाता था...| शाम की वो गर्म समय भी मस्त था, बाल को भींगा के सवारना.. आयना के सामने खरा होकर सोचना यार..कल से क्रिकेट बंद कर दूंगा ..भाई चेहरा काला होते जा रहा है...पुरे शरीर पर नायसेल पाउडर लेपना.. और फिर जीन्स टीशर्ट पहन के शान से निकलना.. लगता था हमसे ज्यादा स्मार्ट तो धरती पर कोई नहीं होगा.. |
पर अब आती थी दुखदाई समय... पढाई करने का... इतने थके होते थे और फिर भी पढ़ना ...डर भी कोई चीज होती थी.. दुनिया का सबसे बड़ा आतंक घर में ही लगता था...लाइट की भी हमसे नहीं बनती थी शाम की 6 -10 नहीं आती थी... फिर भी पढ़ते थे.. बीच- बीच में १० बहाना बनाना , बहन से लड़ना, ये सब होती थी..और सबसे मजेदार उंघते हुए पढाई का वो मजा... अगर आपने किया हो तो याद आ ही गया होगा....कभी- कभी दादीमाँ देख लेती तो तुरंत खाना मिल जाता था.. पर कहते वक़्त भी हिदायतें ..उफ़ | पर इस सब में सबसे मजेदार था नींद... क्या मस्त नींद आती थी पता ही नहीं चलता था... ऐसी में भी नींद की खुसामद होती है..वहां तो लाइट न भी हो फिर भी जबरदस्त सोते थे...
आज दिल्ली की इस चिलचिलाती धुप में "सुदर्शन फाकीर" की वो चंद पंक्ति दिल से निकलती है ,"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो काग़ज़ कि कश्ती, वो बारिश का पानी"
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