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मेट्रो का सफर

सुबह-सुबह घर से निकला ऑफिस के लिए, नया-नया दिल्ली आया था सोचा मेट्रो से ही चला जाय. वैसे मेट्रो के सफर का आनंद मैं ले चूका था. परन्तु ऑफिस के लिए प्रथम था. ग्रीन लाइन की मेट्रो मिली और मैं ४ कोच वाले मेट्रो, जो कीर्तिनगर की ओर जा रही थी, प्रविष्ट हुआ. अध्भुत आनंद की अनुभूति हुई....... पूर्णतः साफ़ एसी कोच...सभी लोग बिजी दिख रहे थे.. कुछ अपने मोबाइल पर चैट कर रहे थे तो कुछ गेम का आनंद ले रहे थे...कुछ सज्जन जिन्हें बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था.. या तो वो डेली न्यूज़ पेपर में व्यस्त थे या फिर देश के समस्याओं पर चर्चा में लगे थे... गाड़ी हर २ मिनट पर 30 सेकंड के लिए रूकती हुई चल रही थी...अशोक पार्क में स्टेशन आते ही लोगों का वो हुजूम आया कि पता ही नहीं चला कि मैं कैसे एक दरवाजे क़े पास से दूसरे क़े पास पहुँच गया.
गाड़ी कीर्तिनगर पहुंची, पर गाड़ी रुकते ही लोग ऐसे भागे जैसे आज सिर्फ एक गाड़ी आने वाली है... एक सज्जन ने ऐसे धक्का दिया की मैं गिरते-गिरते बचा... और ऊपर से उनकी सलाह --भाई अगर जल्दी न हो तो साइड हो जा...ऑफिस वालों को जाने दे... | यह मेरी यात्रा का प्रथम पड़ाव था, अब मुझे ब्लू लाइन की गाड़ी पकरनी थी.. किसी तरह अगले गाड़ी में प्रविस्ट हुआ.. इस गाड़ी में भी कमोबेश हालत एक से थे... एक भद्र से दिखने वाले स्टूडेंट पर नजर रुक गयी.. वो चेतन भगत की मशहूर पुस्तक " 3 mistakes of my life " पढ़ रहा था.. पर आश्चर्य की बात तो ये थी की वो कान में लिड लगा क़े गाने भी सुन रहा था.. आवाज भी बाहर आ रही थी... गाने में हनी सिंह थे.. देख क़े मजा आ गया.. भाई की क्षमता देख क़े शर्मा गया की हमें तो किताब पढ़ते समय आवाज भी अच्छी नहीं लगती और इनको देखो.. मन ही मन सलाम किया... अगला स्टेशन पर उनके उतरते ही एक प्रेमी युगल ने प्रवेश किया.... दोनों की उम्र 17 -18 क़े बीच थी....लिड का एक हिस्सा लड़के ओर दूसरा लड़की क़े कान मैं था... गब्बर का डायलाग याद आया.. "बहुत याराना लगता है ". गाड़ी मैं अनाउंसमेंट हुआ.. कृपया दुरी का ध्यान रखें और उन्होंने उसे फॉलो किया...पर अचानक कुछ हुआ ओर लड़की गुस्सा हो गयी ओर ५ मिनट में पता चल गया की दिल्ली वाली गर्लफ्रेंड कैसे होती हैं...
खैर गाड़ी राजीव चौक पे आ चुकी थी, अब समय था हुजूम क़े अंदर आने का.......इनके बीच एक अंकल भी आये.. ५० की उम्र थी सायद... एक लड़का सीट पे बैठा सो रहा था... अंकल ने डांटा और कहा तुम्हें शर्म नहीं आती...में खरा हूँ और आप इग्नोर कर रहे हो.. लड़के ने नम्रता से जवाब दिया.-" अंकल मै जनरल सीट पर हूँ.. और नाईट शिफ्ट क़े कारन बैठा हुँ..फिर क्या था २ ग्रुप हो गए और कुछ अंकल क़े तरफ और कुछ लड़के की तरफ ...गाड़ी केंद्रीय सचिवालय पहुँच गयी ...और मै उनकी कहानी अधूरी छोड़ क़े उतर गया..
अब समय था आखिरी मेट्रो वायलेट लाइन क़े मेट्रो में जाने का... सीढियोँ पर चढ़ते हुए कुछ कॉलेज क़े बच्चे मिले जो इतने बिजी सीढ़ी पर बैठ कर पढाई कर रहे थे ....देख कर कलाम साहब की जीवनी याद आ गया... वाह उनकी जज्बा को मन ही मन सलाम किया ओर आगे निकल गया... ऐसा लगा जैसे हम पढाई कम किया करते थे और मन ही मन मेट्रो वालों को धन्यवाद दिया कि ३ घंटा तक के फ्री पास के कारण बच्चो को कितना सुविधा मिलता है............खैर किसी तरह ऑफिस पहुंचा.... ऑफिस क़े एसी का आनंद लेना शुरू किया ही था की पीछे से चौधरी सर की आवाज आई ..भाई तू बैठा है..आज कोर्ट नहीं जायेगा.... फिर क्या.. निकल पर अपने सफर पर...because boss is always right........

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